रक्षाबंधन की शुरुआत के पीछे कई कहानियां हैं, जिनमें से एक मुगल बादशाह हुमायूं से भी जुड़ी है
रक्षाबंधन का त्योहार भाई-बहन के गहरे प्रेम और रिश्ते को समर्पित होता है। चाहे हम अपने भाई-बहनों से कितना भी झगड़ लें, उनके बिना हमारी ज़िंदगी अधूरी लगती है। इस दिन भाई-बहन के इसी प्यारे से रिश्ते को मनाया जाता है। इस साल सावन मास की पूर्णिमा को रक्षाबंधन (Raksha Bandhan 2024) 19 अगस्त को मनाया जाएगा। इस दिन बहनें सजी-धजी अपने भाई की आरती उतारती हैं, टीका लगाती हैं और उसकी कलाई पर राखी बांधकर उसकी सुरक्षा और खुशहाली की कामना करती हैं। बदले में भाई अपनी बहन को हमेशा उसकी रक्षा करने का वचन देता है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि रक्षाबंधन की शुरुआत कैसे हुई? इसके पीछे कई धार्मिक और ऐतिहासिक कहानियां हैं, जिनसे इस त्योहार का महत्व जुड़ा है।
रक्षाबंधन का त्योहार भाई-बहन के गहरे प्रेम और रिश्ते को समर्पित होता है। चाहे हम अपने भाई-बहनों से कितना भी झगड़ लें, उनके बिना हमारी ज़िंदगी अधूरी लगती है। इस दिन भाई-बहन के इसी प्यारे से रिश्ते को मनाया जाता है। इस साल सावन मास की पूर्णिमा को रक्षाबंधन (Raksha Bandhan 2024) 19 अगस्त को मनाया जाएगा। इस दिन बहनें सजी-धजी अपने भाई की आरती उतारती हैं, टीका लगाती हैं और उसकी कलाई पर राखी बांधकर उसकी सुरक्षा और खुशहाली की कामना करती हैं। बदले में भाई अपनी बहन को हमेशा उसकी रक्षा करने का वचन देता है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि रक्षाबंधन की शुरुआत कैसे हुई? इसके पीछे कई धार्मिक और ऐतिहासिक कहानियां हैं, जिनसे इस त्योहार का महत्व जुड़ा है।
कृष्ण और द्रौपदी की कहानी
महाभारत की एक प्रसिद्ध कथा के अनुसार, भगवान कृष्ण द्रौपदी को अपनी बहन मानते थे। एक बार जब कृष्ण की उंगली में चोट लग गई और खून बहने लगा, तो द्रौपदी ने अपनी साड़ी का एक हिस्सा फाड़कर उनकी उंगली पर बांध दिया। द्रौपदी के इस प्रेम और समर्पण से प्रभावित होकर, कृष्ण ने उन्हें सदैव उनकी रक्षा का वचन दिया। बाद में, कौरवों की सभा में जब द्रौपदी का चीर हरण हो रहा था, तब कृष्ण ने चमत्कार करके उनकी लाज बचाई। कहा जाता है कि तभी से रक्षाबंधन का त्योहार मनाने की परंपरा शुरू हुई, जिसमें बहनें अपने भाई की कलाई पर राखी बांधती हैं और भाई उनकी रक्षा का संकल्प लेते हैं।
देवी लक्ष्मी और राजा बाली की कथा
एक और कहानी देवी लक्ष्मी और राजा बाली से जुड़ी है। राजा बाली, भगवान विष्णु के परम भक्त थे, और उन्होंने भगवान विष्णु से अपनी सुरक्षा का वचन लिया था। इसके चलते भगवान विष्णु ने बाली के द्वारपाल के रूप में रहना शुरू कर दिया, जिससे देवी लक्ष्मी वैकुंठ में अकेली हो गईं। अपने पति को वापस लाने के लिए देवी लक्ष्मी ने साधारण स्त्री का रूप धारण किया और राजा बाली से आश्रय मांगा। बाली ने उन्हें अपने महल में जगह दी, और लक्ष्मी के आने से उनके जीवन में समृद्धि बढ़ने लगी। सावन मास की पूर्णिमा के दिन लक्ष्मी ने बाली की कलाई पर एक धागा बांधा और उसकी मंगल कामना की। बाली ने खुश होकर उन्हें कोई भी इच्छा मांगने को कहा। तब लक्ष्मी ने अपने असली रूप में प्रकट होकर भगवान विष्णु को वापस वैकुंठ लौटाने की इच्छा जताई, जिसे बाली ने स्वीकार कर लिया। तभी से रक्षाबंधन का त्योहार मनाने की प्रथा चली आ रही है।
रानी कर्णावती और हुमायूं की कहानी
रक्षाबंधन की कहानियों में रानी कर्णावती और मुगल सम्राट हुमायूं की कहानी भी बहुत प्रसिद्ध है। मेवाड़ की रानी कर्णावती, जो राजा राणा सांगा की पत्नी थीं, को गुजरात के शासक बहादुर शाह के आक्रमण से मेवाड़ को बचाने की चुनौती का सामना करना पड़ा। उन्होंने मुगल सम्राट हुमायूं को राखी भेजकर सहायता की गुहार लगाई। हुमायूं ने रानी कर्णावती की रक्षा के लिए अपनी सेना लेकर निकलने का निर्णय लिया, लेकिन जब तक वह मेवाड़ पहुंचे, तब तक रानी कर्णावती ने जौहर कर लिया था और बहादुर शाह ने मेवाड़ पर विजय प्राप्त कर ली थी। इस घटना ने रक्षाबंधन की महत्ता को और भी बढ़ा दिया।
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